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[129+] Manzil Shayari In Hindi | मंजिल शायरी | Shayari on Manzil

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Manzil Shayari

Manzil Shayari

मंज़िल होगी आसमाँ ऐसा यकीं कुछ कम है
अपने नक्शे के मुताबिक़ ये ज़मीं कुछ कम है


ज़िंदगी हसीं है इससे प्यार करो;
हर रात की नयी सुबह का इंतज़ार करो;
वो पल भी आएगा, जिसका आपको इंतज़ार है;

बस अपने रब पर भरोसा और वक़्त पर ऐतबार करो।


काम करो ऐसा, कि पहचान बन जाये;
हर कदम ऐसा चलो, कि निशान बन जाये!
यहाँ ज़िन्दगी तो सभी काट लेते हैं;
ज़िन्दगी जियो ऐसी, कि मिसाल बन जाये!


कोशिश करो की कोई हम से न रूठे!
जिन्दगी में अपनों का साथ न छूटे!
रिश्ते कोई भी हो उसे ऐसे निभाओ!
कि उस रिश्ते की डोर ज़िन्दगी भर न छूटे!


रख हौंसला, वो मंजर भी आएगा;
प्यासे के पास समंदर भी आएगा;
थक कर ना बैठ, ऐ मंजिल के मुसाफिर;
तुझे मंजिल भी मिलेगी और मिलने का मज़ा भी आएगा


मौत को भी जीना सिखा देंगे;
बुझी जो शमा उसे जला देंगे;
जिस दिन हम जाएंगे दुनिया से;
एक बार तो दुश्मनों को भी रुला देंगे।


सीढ़िया उन्हें मुबारक हो
जिन्हें सिर्फ़ छत तक जाना है,
मेरी मंजिल तो आसमान है
रास्ता मुझे ख़ुद बनाना है.


रख हौसला वो मंज़र भी आएगा,
प्यासे के पास चल के समन्दर भी आएगा,
थक कर ना बैठ ऐ मंजिल के मुसाफ़िर
मंजिल भी मिलेगी, और मिलने का मज़ा भी आएगा


डर मुझे भी लगा फ़ासला देख कर,
पर मैं बढ़ता गया रास्ता देख कर,
ख़ुद-ब-ख़ुद मेरे नजदीक आती गई,
मेरी मंजिल मेरा हौंसला देख कर.


मंजिल मिले या ना मिले,
ये तो मुकद्दर की बात है,
हम कोशिश भी ना करे
ये तो गलत बात हैं


हल मुश्किल का पाने के लिए
दिमागी पेच लड़ाने पड़ते हैं,
बैठे-बैठे मंजिल नहीं मिलती
कुछ कदम बढ़ाने पड़ते हैं.


ना पूछों कि मेरी मंजिल कहाँ है,
अभी तो सफ़र का इरादा किया है,
ना हारूँगा हौसला उम्र भर
ये मैंने किसी से नहीं, खुद से ही वादा किया है.


सपनों की मंजिल पास नहीं होती,
जिन्दगी हर पल उदास नहीं होती,
ख़ुदा पर यकीन रखना मेरे दोस्त,
कभी-कभी वो भी मिल जाता है
जिसकी आस नहीं होती


रास्तों की परवाह करूँगा,
तो मंजिल बुरा मान जायेगी,
फ़िक्र छोड़ दूँ रास्तों की
तो मंजिल ख़ुद ही
मेरे पास आती नजर आएगी.


जो तूफानों से डर जाओगे,
तुम अपनी किश्ती को कैसे पार लगाओगे,
डर के आगे जीत है जिस दिन तुम यह समझ जाओगे
अपनी मंजिल तक खुद ही पहुँच जाओगे


अगर दिलकश हो रास्ता,
फिर तो फिकर ही नहीं है,
ना मिले मंजिल ना सही,
फिर भी जिन्दगी हंसीं है.


ऐ मेरी मंजिल थोड़ा सब्र रख बस पहुंचने वाला हूँ मैं,

जरा इन मुसीबतों से निपट लू

बस तुझे अपने सीने से लगाने आ रहा हूँ मैं।


रास्ते कहाँ ख़त्म होते हैं ज़िंदग़ी के सफ़र में,

मंज़िल तो वहाँ है जहाँ ख्वाहिशें थम जाएँ।


ये राहें ले ही जाएँगी मंज़िल तक हौसला रख

कभी सुना है कि अंधेरों ने सवेरा ना होने दिया।


रास्ता भटकाने वाले बहुत मिलेंगे मंजिल पाने के सफर में,

लेकिन तू अपने हौसलों को मत भटकने दियो मंजिल पाने से।


मंजिल पाने का सफर थोड़ा कठिन जरूर होता है,

लेकिन मंजिल मिलते हैं जिंदगी में सुकून मिलने लगता है।


मंजिल शायरी

मंजिल शायरी

किसी को घर से निकलते ही मिल गई
मंज़िल कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा


गम ना कर ज़िंदगी बहुत बड़ी है,
चाहत की महफ़िल तेरे लिए सजी है,
बस एक बार मुस्कुरा कर तो देख,
तक़दीर खुद तुझसे मिलने बाहर खड़ी है…


ये राहें ले जायेंगी मंज़िल तक,
हौसला रख ए मुसाफ़िर ..
कभी सुना है क्या 
अंधेरे ने सवेरा होने ना दिया


तु ही बता ए ज़िंदगी;
इस ज़िंदगी का क्या होगा;
कि हर पल मरने वालों को;
जीने के लिए भी वक़्त नहीं।


तू रूठा रूठा सा लगता है कोई तरकीब बता मानाने की

मैं ज़िन्दगी गिरवी रख दूंगा तू क़ीमत बता मुस्कुराने की


यही अंदाज है मेरा समंदर फतह करने का,
मेरी कागज की कश्ती में कई जूगनु भी होते है


मंजिल उन्हीं को मिलती है
जिनके हौसलों में जान होती है
और और बंद भट्ठी में भी दारू उन्हीं को मिलती है
जिनकी भट्ठी में पहचान होती है


जहाँ याद न आये तेरी वो तन्हाई किस काम की
बिगड़े रिश्ते न बने तो खुदाई किस काम की
बेशक़ अपनी मंज़िल तक जाना है हमें
लेकिन जहाँ से अपने न दिखें वो ऊंचाई किस काम की


किस हद तक जाना है ये कौन जानता है
किस मंजिल को पाना है ये कौन जानता है
दोस्ती के दो पल जी भर के जी लो
किस रोज़ बिछड जाना है ये कौन जानता है


मंजिल मिलने से दोस्ती भुलाई नहीं जाती
हमसफ़र मिलने से दोस्ती मिटाई नहीं जाती
दोस्त की कमी हर पल रहती है यार
दूरियों से दोस्ती छुपाई नहीं जाती


बेताब तमन्नाओ की कसक रहने दो…
मंजिल को पाने की कसक रहने दो…
आप चाहे रहो नज़रों से दूर…
पर मेरी आँखों में अपनी एक झलक रहने दो


कभी कभी लंगड़े घोड़े पे दाव
लगाना ज्यादा सही होता है,
क्योंकि दर्द जब जूनून बन जाए
तब मंजिल बहुत नजदीक लगने लगती हैं


ठोकरे मिलती है सफलता की राहों में
यह हर कोई जानता है,
पर मंजिल सिर्फ उसी को मिलती है
जो कभी हार नहीं मानता है


उल्फत में अक्सर ऐसा होता है,
आँखें हंसती है और दिल रोता है,
मानते है हम जिन्हें मंजिल अपनी
हमसफ़र उनका कोई और होता हैं.


कोशिश के बावजूद हो जाती है कभी हार,
होकर निराश मत बैठना ऐ मेरे यार,
बढ़ते रहना आगे ही जैसे भी मौसम हो,
पा लेती मंजिल चींटी भी…गिर फिर कर कई बार


सामने हो मंजिल तो रास्ते ना मोड़ना,
जो भी मन में हो वो सपना मत तोड़ना,
कदम कदम पर मिलेगी मुश्किल आपको
बस सितारे छूने के लिए जमीन मत छोड़ना


ना पूछों कि मेरी मंजिल कहाँ है,
अभी तो सफ़र का इरादा किया है,
ना हारूँगा हौसला उम्र भर
ये मैंने किसी से नहीं, खुद से ही वादा किया है


ना किसी से कोई ईर्ष्या,
ना किसी से कोई होड़,
मेरी अपनी मंजिल
मेरी अपनी दौड़


मेरी हर अदा का आइना तुझसे है,
मेरी हर मंजिल का रास्ता तुझसे है,
कभी दूर न होना मेरी जिन्दगी से
मेरी हर ख़ुशी का वास्ता तुझसे है


मिट्टी का तन है,
क्या दिन रात सजाना,
मिट्टी ही मंजिल,
तन पर क्या इतराना


रोक नहीं सकता कोई,
मन से इतना कहना होगा,
मंजिल को पाने के लिए
कठिन रास्तों पर चलाना होगा


Manzil Shayari In Hindi

Manzil Shayari In Hindi

एक न एक दिन हासिल कर ही लूँगा,
‘ठोकरें’ जहर तो नहीं जो खाकर मर जाऊँगा


उल्फत में अक्सर ऐसा होता है
आँखे हंसती हैं और दिल रोता है
मानते हो तुम जिसे मंजिल अपनी
हमसफर उनका कोई और होता है


मेरी पतंग भी तुम हो
उसकी ढील भी तुम
मेरी पतंग जहां कटकर गिरे
वह मंज़िल भी तुम


हर सपने को अपनी साँसों में रखे
हर मंज़िल को अपनी बाहों में रखे
हर जीत आपकी ही है
बस अपने लक्ष्य को अपनी निगाहों में रखे


बेताब तमन्नाओ की कसक रहने दो
मंजिल को पाने की कसक रहने दो
आप चाहे रहो नज़रों से दूर
पर मेरी आँखों में अपनी एक
झलक रहने दो


मंजिल मिलने से दोस्ती भुलाई नहीं जाती
हमसफ़र मिलने से दोस्ती मिटाई नहीं जाती
दोस्त की कमी हर पल रहती है यार
दूरियों से दोस्ती छुपाई नहीं जाती


इन उम्र से लम्बी सड़को को
मंज़िल पे पहुंचते देखा नहीं
बस दोड़ती फिरती रहती हैं
हम ने तो ठहरते देखा नहीं


ना किसी से ईर्ष्या
ना किसी से कोई होड़
मेरी अपनी मंजीले
मेरी अपनी दौड़


मैं अकेला ही चला था
जानिब-ए-मंज़िल मगर
लोग साथ आते गये और
कारवाँ बनता गया


किस हद तक जाना है ये कौन जानता है
किस मंजिल को पाना है ये कौन जानता है
दोस्ती के दो पल जी भर के जी लो किस
रोज़ बिछड जाना है ये कौन जानता है


रास्तों पर निगाह रखने वाले
भला मंज़िल कहाँ देख पाते हैं
मंज़िलों तक तो वही पहुँचते हैं
जो रास्तों को नज़रअंदाज़ कर जाते हैं


डर मुझे भी लगा फांसला देख कर
पर मैं बढ़ता गया रास्ता देख कर
खुद ब खुद मेरे नज़दीक आती गई
मेरी मंज़िल मेरा हौंसला देख कर


मंजिल उन्हीं को मिलती है
जिनके हौसलों में जान होती है
और और बंद भट्ठी में भी दारू उन्हीं को मिलती है
जिनकी भट्ठी में पहचान होती है


उसे न चाहने की आदत उसे
चाहने का जरिया बन गया
सख्त था मैं लड़का अब प्यार
का दरिया बन गया


मैने इक माला की तरह तुमको
अपने आप मे पिरोया हैं
याद रखना टूटे अगर हम तो
बिखर तुम भी जाओगे


जो नज़रें रूकती नहीं ढूढंते
हुए मंज़िल-ए-अहम
उन नज़रों की गिरफ़्त में एक
ज़माना आज भी क़ैद हैं


मंजिल शायरी हिन्दी

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मंज़िल जुदा राहें जुदा फिर भी जुदा नहीं
वो चला गया पर क्यों मैं उससे ख़फा नहीं


मंज़िल का पता है न किसी राहगुज़र का
बस एक थकन है कि जो हासिल है सफ़र का


फ़रेब हम को न क्या क्या इस आरज़ू ने दिये 
वही थी मंज़िल-ए-दिल हम जहाँ से लौट आए


चलता रहूँगा मै पथ पर, चलने में माहिर बन जाउंगा,
या तो मंज़िल मिल जायेगी, या मुसाफिर बन जाउंगा


मंज़िल तो मिल ही जायेगी भटक कर ही सही,
गुमराह तो वो हैं जो घर से निकला ही नहीं करते।


मंज़िल उन्ही को मिलती है जिनके सपनो में जान होती है,
पंख से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है


उन्हें फ़ुरसत ही नहीं है गेरौ की महफ़िल से,
इक हम है कि आज भी उन्हें अपनी मंज़िल बनाए बैठे है


मोहब्बत में सहर ऐ दिल बराए नाम आती है
ये वो मंज़िल है जिस मंज़िल में अक्सर शाम आती है


सामने मंज़िल थी और पीछे उसका वजूद; क्या करते हम भी यारों;

रुकते तो सफर रह जाता चलते तो हमसफ़र रह जाता।


अभी ना पूछो मंज़िल कँहा है, अभी तो हमने चलने का इरादा किया है।
ना हारे हैं ना हारेंगे कभी, ये खुद से वादा किया है।


मुश्किलें जरुर है, मगर ठहरा नही हूँ मैं
मंज़िल से जरा कह दो, अभी पहुंचा नही हूँ मैं.


Manzil Shayari In Hindi

 

Manzil Shayari In Hindi

जिस दिन से चला हूं मेरी मंज़िल पे नज़र है
आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा


परिंदो को मिलेगी मंज़िल एक दिन , ये फैले हुए उनके पर बोलते है.

और वही लोग रहते है खामोश अक्सर, ज़माने में जिनके हुनर बोलते है


दिल बिन बताए मुझे ले चल कही…
जहां तू मुस्कुराएं मेरी मंज़िल वही


किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल
कोई मेरी तरह ताउम्र सफ़र में रहा


ज़िन्दगी! मौत तेरी मंज़िल है।। दूसरा कोई रास्ता ही नहीं।।
सच घटे या बढ़े तो सच न रहे।। झूठ की कोई इन्तहा ही नहीं।।


मिलना किस काम का अगर दिल ना मिले,
चलना बेकार हे जो चलके मंज़िल ना मिले


न मंज़िल का, न मकसद का , न रस्ते का पता है
हमेशा दिल किसी के पीछे ही चलता रहा है


अगर तेरे इरादे दमदार हैं

तो खुदा कसम तुझे तेरी मंजिल मिलना बिलकुल तय है।


चलता जा बस मत सुन किसी की भी,

खुद पर भरोसा रख अपनी मंजिल तक जरूर पहुंचेगा तू भी।


किस्मत कभी भी आपको आपकी मंजिल तक नहीं ले जाएगी,

बल्कि आपकी मेहनत और निष्ठां आपको आपकी मंजिल तक ले जाएगी।


हर सपने को अपनी साँसों में रखे, हर मंज़िल को अपनी बाहों में रखे,

हर जीत आपकी ही है, बस अपने लक्ष्य को अपनी निगाहों में रखे।


मन की जो सुनी थी उसने… अपनी मंज़िल पानी थी !
ख़्वाब तो पुरे होने ही थे.. उसने दिल से जो ठानी थी


मंज़िल-ए-इश्क पे तनहा पहुँचे कोई तमन्ना साथ न थी,
थक थक कर इस राह में आख़िर इक इक साथी छूट गया

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