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[ 81+ Latest ] Insaniyat Shayari | Shayari On Insaniyat

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Insaniyat Shayari

Insaniyat Shayari

पहले ज़मीं बँटी फिर घर भी बँट गया,
इंसान अपने आप में कितना सिमट गया


यहाँ लिबास की क़ीमत है आदमी की नहीं,
मुझे गिलास बड़े दे शराब कम कर दे।


इन्सानियत की रौशनी गुम हो गई कहाँ,
साए तो हैं आदमी के मगर आदमी कहाँ


बहुत हैं सज्दा-गाहें पर दर-ए-जानाँ नहीं मिलता
हज़ारों देवता हैं हर तरफ़ इंसाँ नहीं मिलता


हमारी आरजूओं ने हमें इंसान बना डाला,
वरना जब जहां में आये थे बन्दे थे खुदा के।


आदमी का आदमी हर हाल में हमदर्द हो
इक तवज्जोह चाहिए इंसाँ को इंसाँ की तरफ़


नई मंज़िल नया जादू उजाला ही उजाला
दूर तक इंसानियत का बोल-बाला


घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला


मेरी जबान के मौसम बदलते रहते हैं,
मैं तो आदमी हूँ मेरा ऐतबार मत करना।


Shayari On Insaniyat

Shayari On Insaniyat

ऐ आसमान तेरे ख़ुदा का नहीं है ख़ौफ़
डरते हैं ऐ ज़मीन तिरे आदमी से हम।


इल्म-ओ-अदब के सारे खजाने गुजर गए,
क्या खूब थे वो लोग पुराने गुजर गए,
बाकी है बस जमीं पे आदमी की भीड़,
इंसान को मरे हुए तो ज़माने गुजर गए।


दरख्तों से ताल्लुक का हुनर
सीख ले इंसान,
जड़ों में ज़ख्म लगते हैं
तो टहनियाँ सूख जाती हैं।


जिस्म की सारी रगें तो
स्याह खून से भर गयी हैं,
फक्र से कहते हैं फिर भी
हम कि हम इंसान हैं।


यहाँ हर कोई रखता है
खबर ग़ैरों के गुनाहों की,
अजब फितरत हैं,
कोई आइना नहीं रखता।


इल्म-ओ-अदब के सारे खज़ाने गुजर गए,
क्या खूब थे वो लोग पुराने गुजर गए,
बाकी है बस जमीं पे आदमी की भीड़,
इंसान को मरे हुए तो ज़माने गुजर गए।


इल्म-ओ-अदब के सारे खजाने गुजर गए,
क्या खूब थे वो लोग पुराने गुजर गए,
बाकी है बस जमीं पे आदमी की भीड़,
इंसान को मरे हुए तो ज़माने गुजर गए।


इंसानियत को सूली चढ़े हुए,
यहाँ एक ज़माना बीत गया है,
होठों पर तो झूट है लेकिन,
हाथ में देखो गीता है।


हर हाथ में खंजर,
हर दिल में एक चोर क्यों है?
आईने के सामने मैं हूँ,
मगर आईने में कोई और क्यों है?
इंसान हैं सभी तो इंसानियत क्यों नहीं है?
या उनमें दिल नहीं है,
और है तो इतना शख्त क्यों?


Insaniyat Shayari in Hindi

Insaniyat Shayari in Hindi

फितरत सोच और हालात में फर्क है वरना,
इन्सान कैसा भी हो दिल का बुरा नहीं होता।


हम खुदा थे गर न होता दिल में कोई मुद्दा,
आरजूओं ने हमारी हमको बंदा कर दिया।


दिल के मंदिरों में कहीं बंदगी नहीं करते,
पत्थर की इमारतों में खुदा ढूंढ़ते हैं लोग।


हमारी आरजूओं ने हमें इंसान बना डाला,
वरना जब जहां में आये थे बन्दे थे खुदा के


इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं,
दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बाद।


पहले ज़मीं बँटी फिर घर भी बँट गया,
इंसान अपने आप में कितना सिमट गया।


मिटता हो ज़रूरी तो आज मिट जा ऐ इंसान
मगर मिटने के बाद भी इंसानियत ज़िन्दा रख


हार जा चाहे ज़िन्दगी मे सब कुछ
मगर फिर से जीतने की वो उम्मीद ज़िन्दा रख


सुल्तान भी बन जाए तो
दिल में फ़क़ीर ज़िन्दा रख


Shayari On Insaniyat In Hindi

Shayari On Insaniyat In Hindi

इन्सानियत की रौशनी गुम हो गई कहाँ,
साए तो हैं आदमी के मगर आदमी कहाँ?


हर आदमी होते हैं दस बीस आदमी…
जिसको भी देखना कई बार देखना।


खुदा न बदल सका आदमी को आज भी यारों,
और आदमी ने सैकड़ो खुदा बदल डाले।


देखें करीब से तो भी अच्छा दिखाई दे,
इक आदमी तो शहर में ऐसा दिखाई दे।


जिस्म की सारी रगें तो स्याह खून से भर गयी हैं,
फक्र से कहते हैं फिर भी हम कि हम इंसान हैं।


जिन्हें महसूस इंसानों के रंजो-गम नहीं होते,
वो इंसान भी हरगिज पत्थरों से कम नहीं होते।


वो जानता नहीं किसी को, मगर धीरज बंधाता है !
निरंतर कर्म के पथ पर, वो बढ़ते ही जाता है !


उसे मालूम है कि जिन्दगी, तो भगवान ने दी है !
पर करे जन की सेवा वह यह उसकी भी हसरत है !


खरी खोटी वो सुनता है, फिर भी खामोश रहता है !
अपनी असफलता का उसको, बहुत अफसोस रहता है !


2 Line Shayari On Insaniyat

2 Line Shayari On Insaniyat

सच्चाई थी पहले के लोगों की जुबानों में,
सोने के थे दरवाजे मिट्टी के मकानों में।


मज़हबी बहस मैंने की ही नहीं
फ़ालतू अक़्ल मुझमें थी ही नहीं


बुरा बुरे के अलावा भला भी होता है
हर आदमी में कोई दूसरा भी होता है


इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं,
दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बाद।


आदमी का आदमी हर हाल में हमदर्द हो
इक तवज्जोह चाहिए इंसाँ को इंसाँ की तरफ़


ऐ आसमान तेरे ख़ुदा का नहीं है ख़ौफ़
डरते हैं ऐ ज़मीन तेरे आदमी से हम।


अगर हो जाए सफल तो, हजारों दुआएँ लेता है !
अगर वो हार जाए तो, लोगों का क्रोध सहता है !


केस कितना भी गंभीर हो, वो हिचकिचाता नहीं कभी !
मुकद्दमे की पेचीदगी देखकर, वो सकुचाता नहीं कभी !!


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